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FIR और NCR मे क्या अंतर हैं? | Difference between FIR and NCE

FIR और NCR मे क्या अंतर हैं? | Difference between FIR and NCE



सामाज मे अक्सर आये दिन कही ना कही कोई अपराध होते रहते है। उन अपराधों को पुलिस स्टेशन मे दर्ज करवाने के लिए शिकायत देने के बाद पुलिस द्वारा गंभीर अपराध होने के बावजूद भी उस अपराध को गंभीरता से नही लिया जाता। इसितरह कई बार मोबाइल, पर्स, क्रेडिट या डेबिट कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस आदी वस्तुए गुम हो जाने अथवा चोरी हो जाने पर भी और किन्ही कारणों से दो ग्रूप मे आपसी झगडे या गाली-गलौच हो जाने पर पुलिस स्टेशन में जाकर शिकायत दर्ज कराई जाती है। पुलिस द्वारा इस तरह के मामलों में ज्यादातर FIR की बजाए NCR दर्ज कराई जाती है।

आम लोगोंको एनसीआर और एफआईआर मे जादातर कोई फर्क नजर नही आता। और पुलिस अपने काम को टालने के लिए और शिकायकत कर्ता के तसल्लि के लिए एनसीआर दर्ज करवाकर शिकायत करता को भेजती है। इस तरह के कई मामले हमे रोजाना देखने और सुनने मिलते है। NCR के बारेमे सुना तो सबने होता है परंतु कानून की दृष्टि से इसके बारे में जानकारी का काफी अभाव है। आज हम इस लेख के माध्यम से NCR से जुडे इन्ही सब पहलुओं पर चर्चा करेंगें। और साथ ही FIR और NCR मे क्या अंतर हैं? क्यों करानी चाहिए एनसीआर, क्या एनसीआर से कोई कार्यवाही नही की जा सकती? अगर कोई एनसीआर से संतुष्ट नहीं है तो क्या करे? इन सभी के बारेमे जानकारी हासिल करने वाले है।


अपराध के प्रकार

कानून मे सीआर.पी.सी. के तहत अपराध को दो श्रेणी में विभाजित किया गाया है। (1) संज्ञेय अपराध (Cognizable offence) और (2) असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable offence)

FIR और NCR मे क्या अंतर हैं? | Difference between FIR and NCE

जिन अपराध को गंभीर अपराधों मे रखा जाता है उन अपराधों के शिकायत आने पर पुलिस द्वारा एफआईआर द्रज किया जाता है और जिन अपराधों को कम गंभीर अपराधों मे गिना जाता है उन अपराधों की शिकायत पुलिस को मिलने से उन आपराध के द्वारा  पुलिस एनसीआर दर्ज करवालेती है।

  1. आमतौर पर समाज मे जो गंभीर किस्म के अपराध होते है उन्हे सीआर.पी.सी. के तहत संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। पुलिस को इन अपराधों कि शिकायत मिलने पर वे खुद इन अपराधों का संज्ञांन ले सकती है। इन अपराधों की जांच करने के लिए पुलिस को कोर्ट से किसीभी प्रकार की अनुमती लेनेली जरूरत नहीं होती, तथा इन मामलों में पुलिस द्वारा आरोपी को बिना वारंट के गिरफ्तारी भी कि जा सकता है। इस तरह के गंभीर अपराध के शिकायत मिलने पर पुलिस द्वारा पहले एफ.आई.आर. दर्ज की जाती है और तुरंत जांच सुरू कि जाती है।
  2. आमतौर पर समाज मे जो कम गंभीर अपराध होते है उन्हे सीआर.पी.सी. के तहत असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इन अपराधों की जांच के लिए पुलिस को कोर्ट से अनुमति लेने की जरूरत होती है। तथा इस तरह के कम गंभीर मामलों में पुलिस द्वारा बिना वारंट के गिरफ्तारी नहीं कीया जा सकता। तथा इन मामलों में  पुलिस द्वारा बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं की जा सकता। इन मामलों में पुलिस द्वारा एनसीआर दर्ज की जाती है।


क्यों करानी चाहिए एनसीआर

कुछ लोगो का यह मानना हैं कि एनसीआर दर्ज कराने का कोई फायदा नहीं हैं। जबकि उनकी यह धारणा बिल्कुल गलत हैं।
  1. मोबाइल, पर्स, क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस इत्यादि के गुम हो जाने पर अगर उन्का गलत इस्तेमाल होता है तो एनसीआर की कॉपी के आधार पर अपना बचाव किया जा सकता है। इसके साथ ही गुम हुए कुछ दस्तावेजों को दोबारा बनवाने के लिए एनसीआर दर्ज करवा कर उसकी कॉपी जमा करानी पडती है।
  2. कई बार एसा होता है कि छानबीन के दौरान पुलिस द्वारा गुम या चोरी हुए सामान की रिकवरी कर ली जाती है। ऐसी परिस्थिति में एनसीआर की कॉपी के आधार पर वह सामान शिकायतकर्ता को मिल जाती है।

क्या एनसीआर से कोई कार्यवाही नही की जा सकती?

  1. काफी लोगों को यह धारणा है कि, एनसीआर  मात्र रिकॉ्ड के लिए होती है। इसलिए लोग बस एनसीआर दर्ज करके छोड देते हैं। यह भ्रम बिल्कुल गलत है। अगर पीडित व्यक्ति चाहे तो एनसीआर के आधार पे सीआरपीसी की धारा 155(2) के तहत संबंधित कोर्ट के समक्ष याचिका लगा सकता है जिसमें कोर्ट से पुलिस द्वारा मामले की तफ्तीश और आगे की कार्यवायी कराई जाने की अनुमति मांगी जा सकती है। जहां आपको लगे कि आपके मामले में आगे की इन्वेस्टिगेशन जरूरी है तो आप उचित मजिस्ट्रेट के समक्ष यह एप्लीकेशन अवश्य लगाएं और कोर्ट से इन्वेस्टिगेशन की प्रार्थना करें।
  2. किसी असंज्ञेय अपराध के होने पर कई बार पुलिस द्वारा एनसीआर काटने से भी मना कर दिया जाता है। ध्यान दें कि ऐसी परिस्थिति में आप 155(2) के तहत उचित मजिस्ट्रेट के समक्ष एप्लीकेशन भी लगा सकते है और प्रार्थना कर सकते है कि आपकी एनसीआर  पुलिस द्वार दर्ज की जाएं। ऐसे मामलों में कोर्ट द्वार पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही की रिपोर्ट मांगी जाती है और कोर्ट को उचित लगने पर एनसीआर दर्ज करने के आदेश दे दिए जातें हैं।

अगर कोई एनसीआर से संतुष्ट नहीं है तो क्या करे?

आमतौर पर यह भी देखा जाता है कि कोई व्यक्ति अगर गंभीर अपराध कि शिकायत करता है तो उन मामलों में एफआईआर बनती है, लेकिन उनमे भी कई बार देखा गया है की पुलिस द्वारा हल्की धाराएं लगाके उसे मात्र एनसीआर दर्ज कर देती हैं। ऐसे मामले पुलिस द्वार अक्सर तब किया जाता है जब या तो सामने वाली पार्टी का काफी दबाव हो या पुलिस खुद मामले की जांच न करना चाहती हो। ऐसी परिस्थितियों में संबंधित अधिकार क्षेत्र के न्यायालय के समक्ष  सीआरपीसी 156(3) की याचिका लगाई जा सकती है जिसमे कोर्ट से यह प्रार्थना की जा सकती है कि पुलिस को उस मामले में एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए जाएं।

आज हमने इस लेख के माध्यम से NCR से जुडे इन्ही सब पहलुओं को जैसे FIR और NCR मे क्या अंतर हैं? इसके बारेमे चर्चा किया है और हमने इसकते बारेमे हमाने पाठकोंको जानकरी देने कि कोशिश की है। आशा है की आपको यह लेख पसंद आया होगा। इसे अपने दोस्तो के साथ जरूर शेयर करे। 




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