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हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और प्रावधान | Hindu Succession Act In Hindi

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और प्रावधान | Hindu Succession Act In Hindi

Photo by August de Richelieu from Pexels


परिचय

किसी व्यक्ति की संपत्ति, चाहे वह अचल हो या चल, उस व्यक्ति के बाद उसके संपत्ती का निपटान कैसे किया जाता है? उसे अपने जीवनकाल में कैसे करना चाहिए? इसके संबंधमे कानून मे क्या क्या प्रावधान हैं। इसके बारेमे हम लगाएंगे।

कई बार एक हिंदू महिला अथवा पुरुष कुछ संपत्ति को जमा करते हैं। या उन्हे विरासत मे अथवा अन्य माध्यमों से प्राप्त हुवा होता हैं। तब एसे स्थिती मे उनके संपत्ती का निपटान करनेके लिए, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानो के नुसार संपत्ती का निपटान किया जाता है। आइए, इस लेख के माध्यमसे हम विचार करें कि, किसतरह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानोके नुसार संपत्ती का निपटान कैसे किया जाता है।

संपत्ति दो प्रकार की होती है।

  1. स्वंय अर्जित संपत्ति जिसे अंग्रेजीमे Self Acquired Property कहते है। और
  2. पैतृक संपत्ति जिसे अंग्रेजीमे Ancestral Property कहते है।

1. स्वंय अर्जित संपत्ति (Self Acquired Property) :-

        यदि संपत्ति किसी व्यक्ति द्वारा खुद कमाई हुई हो अखवा अधिग्रहित की गई हो, तो उस संपत्ती को स्वंय अर्जित संपत्ती कहते है। तो उस संपत्ती का उपयोग कैसे किया जाए और उसका निपटान कैसे किया जाए। इसका निर्णय लेने का अधिकार, यह पूरी तरह से उस व्यक्ति के उपर निर्भर करता है, जिसने उसे कष्ट से कमाया है। वह व्यक्ति अपने संपत्ति की वसीयत (Will) द्वारा निपटान कर सकता हैं। वसीयत द्वारा, व्यक्ति को अपनी संपत्ति का निपटान करने का पूर्ण अधिकार है। हिंदू महिला को विरासत मे मिली संपत्ती, पुरस्कार के रूप में शादी में मिला, परिवार के विभाजन के समय प्राप्त, स्वयं अर्जित, ऐसे सभी तरीकों से अर्जित संपत्ती यह उसके खुदके स्वामित्व का होता है। याने उस संपत्ती को भी संय अर्जित संपत्ती कह सकते है। तो उसी मुताबिक उसे उसके संपत्ती के बारे में विचार करनेका और वसीयत बनानेका पुरा अधिकार होता है।

2. पैतृक संपत्ति (Ancestral Property) :-

        पूर्वजों से विरासत में मिली हुई संपत्ती को पैतृक संपत्ती कहा जाता है। पैतृक संपत्ती यह पुरी तरह मालिकाना अधिकार प्राप्त नही होने के कारण वह उस संपत्ती को वसियत नामा के नुसार निपटान नही कर सकता। यह सिर्फ उत्तराधिकार के द्वारा उसके उत्तराधिकारियों को जाता है। अथवा उसके उत्तराधिकारियों को अधिकार के रूप मे उन्हे प्राप्त होता हैं।

     अब यदि कोई व्यक्ति वसीयत के द्वारा संपत्ति की व्यवस्था किए बिना उसकी मृत्यू हो जाती है, तो उसकी संपत्ति को विरासत के अधिकार के नूसार निपटीन किया जाता है। यह उसके उत्तराधिकारियों की पैतृक संपत्ति हो जाती है। विरासत के अधिकार के रूप में ऐसी पैतृक संपत्ति का निपटान करना अब आवश्यक है। आइए फिर हम उस अधिनियम के प्रावधानों पर विचार करें।

        हिंदू सक्सेशन ॲक्ट 1956 मे उत्तराधिकारीयो के अधिकारों के बारे में महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। ये प्रावधान हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख आदि सभीपर लागू होते हैं। यह कानून 17 जून 1956 को लागू हुआ और उसीके मुताबीक समान संपत्ति के विभाजन किये जाते है। इस कानून के अनुसार जो वारिसो की सुची बताई गई है, उसके नूसार और धारा 8 में दिए गए वारिसों के चार वर्गों को विभाजित किया गया है। वे इस प्रकार है:-

वर्ग ए- इसमें निम्नलिखित व्यक्ति शामिल हैं। बेटा, बेटी, विधवा, माँ, पूर्व-मृत लड़के का बेटा, पूर्व-मृत लड़के की बेटी, पूर्व-मृत लड़की का बेटा, पूर्व-मृत लड़की की बेटी, पूर्व-मृत लड़के की विधवा, पूर्व- मृत लड़के के पूर्व मृत लड़के का बेटा, पूर्व- मृत लड़के के पूर्व मृत लड़के की बेटी, पूर्व- मृत लड़के के पूर्व मृत लड़के की विधवा।  

वर्ग बी- इसमें निम्नलिखित शामिल हैं। 1) पिता, 2) ए) बेटे की बेटी का बेटा, बी) बेटे की बेटी की बेटी, सी) भाई की बहन, 3) ए) बेटी के बेटे का बेटा, बी) बेटे के बेटे की बेटी, सी) बेटी के बेटे का बेटा, डी) बेटी की बेटी की बेटी, 4) ए) भाई का बेटा, बी) बहन का बेटा, सी) भाई की बेटी, डी) बहन की बेटी, 5) ए) पिता का पिता, बी) पिता की माँ, 6) ए) पिता की विधवा, बी) भाई की विधवा, 7: ए) पिता का भाई , बी) पिता की बहन, 8) ए) माँ के पिता, बी) माँ की माँ, 9) ए) माँ के भाई, बी) माँ की बहन।

नोटिस- वर्ग बी में भाई और बहन में एक ही माँ; लेकिन इसमें एक अलग पिता के साथ एक भाई या बहन शामिल नहीं है।

वर्ग सी - इसमें निम्नलिखित व्यक्ति शामिल हैं। मृतक के पैतृक भाई के रक्त संबंध में या एक व्यक्ति जो गोद लेने के लिए पूरी तरह से पुरुष प्रधान है।

वर्ग डी - मृतक के मामा एक ऐसे व्यक्ति हैं जो रक्त या गोद लेने से संबंधित नहीं हैं, लेकिन पूरी तरह से पुरुष हैं।

बिना वसीयत के, मृत हिंदू पुरुष खाताधारक की संपत्ति मामले के प्रावधानों के अनुसार स्थानांतरित की जाएगी।


  1. पहले उन उत्तराधिकारियों के हक मे जो ऊपर वर्ग ए ’में वर्णित रिश्तेदार होंगे।
  2. दूसरी बार अगर वर्ग ए ’में कोई वारिस नहीं है तो वर्ग’ बी ’में उल्लिखित वारिसों के लिए।
  3. तीसरी बात, यदि, वर्ग ए ’और वर्ग, बी’ में कोई वारिस नहीं है, तो वर्ग सी ’में उल्लिखित उत्तराधिकारियों के पास है।
  4. अंत में, यदि वर्ग, ए ’, वर्ग, बी’, वर्ग ’सी’ में दिखाए गए वारिसों में से कोई भी वारिस नहीं है, तो ऐसे व्यक्तियों की संपत्ति को ऊपर वर्ग ‘डी’ में उल्लिखित वारिसों को हस्तांतरित कर दिया जाएगा।

        इस प्रकार ऊपर दिखाया गया तर्क, उत्तराधिकारियों के वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। और वर्ग के अनुसार पहला उत्तराधिकारी कौन है, उसके बाद किसे अगला उत्तराधिकारी माना जा सकता है, यह हम सब को पता चल जाएगा। हालांकि, इन लोगों के पास इस स्थान पर किस तरह की संपत्ति है, पहले यह जानकरी हासिल करना महत्वपूर्ण होगा।

        यदि किसी व्यक्ति के पास स्वंय अर्जित संपत्ति है और उसके बाद उस संपत्ति का निपटान कैसे करना है, इस बात पर वह व्यक्ती एक वसीयत छोड देता है; लेकिन, वह वसियतनामा इसे किसी कारण से रद्द कर दिया जाता है अर्थात अवैध बना दिया गया। फिरभी, वह संपत्ति बिना वसीयतनामा के संपत्ति के रूप में माना जाएगा और फिर संपत्ति को ऊपर दिए गए वारिसों के विशेषाधिकार के अनुसार वितरित किया जाएगा।

        अब, भले ही उत्तराधिकारीयों को उपरोक्त 4 वर्गोमें विभाजित किया गया है, अगर प्रत्येक वर्ग में एक से अधिक उत्तराधिकारी हैं, तो यह देखना महत्वपूर्ण है कि, यह कैसे करें और कौनसे विरासत को कैसे प्राथमिकता दें।

        अनुसूची के उत्तराधिकारियों के बीच वारिसों का क्रम इस प्रकार है। वर्ग ‘ए’ मे उल्लिखित वारिसों को वर्ग 'ए' में शामिल किया गए है। उसी समय और, वर्ग बी, वर्ग सी, और वर्ग डी के अन्य वारिसों को छोड़कर, प्राथमिकता दी जाएगी। दूसरी प्रविष्टि में शामिल तीसरी प्रविष्टि को विरासत के दावे पर पूर्वता दी जाएगी। उसी तरीके से ऑर्डर करते समय निम्नलिखित प्रविष्टियों में प्राथमिकता दी जाएगी। आइए अब विचार करें कि वर्ग ए और वर्ग बी अनुसूचियों में आने वाले उत्तराधिकारियों के बीच संपत्ती को कैसे वितरित किया जाएगा।
 

अनुसूचीत उत्तराधिकारियों मे, उत्तराधिकारीयोके क्रम:-

यदि खाताधारक के पास वर्ग वारिस है, तो उनकी संपत्ति का हिस्सा निम्नलिखित नियमों के अनुसार उनके बीच विभाजित किया जाएगा।

नियम 1 - मृतक खाताधारक की विधवा, यदि एक से अधिक विधवा हैं, तो सभी विधवाएं एकसाथ एक हिस्सा लेंगी।
नियम 2 - मृतक खाताधारक के जीवित पुत्र, पुत्रियाँ और माँ उनके प्रत्येक एक हिस्सा।
नियम 3 - मृतक खाताधारक के प्रत्येक पूर्व-मृत पुत्र अथवा पूर्व-मृत पुत्री के उत्तराधिकारी उन सब में मिलाकर हिस्सा दिया जाएगा।
नियम 4 - नियम 3 में निर्दिष्ट शेयरों का वितरण -
  1. पूर्व मृतक बच्चों के वारिसों के मामले में, उनकी विधवा (अथवा सभी विधवाओं) और जीवित बेटे और बेटियों को समान हिस्सा प्राप्त होंगे। और उनके पूर्व-मृत बच्चों की हिस्सेमें समान राशि मिलेगी।
  2. पूर्व-मृतक बच्चों के हिस्से के वारिसों के मामले में, इसे इस तरह से किया जाना चाहिए कि बचे हुए लड़के और लड़कियों को बराबर का हिस्सा मिले।

अनुसूची के वर्ग 2 में विरासत में धन का वितरण: -

    यदि वर्ग ‘ए’ में कोई वारिस नहीं है, तो वर्ग बी में वारिस माना जाता है। लेकिन यहां एक बात ध्यानमे रखने के लिए यही है, वर्ग बी में शामिल वारिसों को उसी तरह विरासत में प्राप्त करने का अधिकार नहीं है जैसा कि वर्ग ए में के वारिसों को है। बिना वसीयत के खाताधारक की संपत्ति को बराबर शेयरों में वर्ग बी में पहले उल्लिखित वारिसों को हस्तांतरित किया जाएगा। यदि प्रथम श्रेणी वर्ग बी में किसी वारिस का उल्लेख नहीं है, तो वर्ग बी मे उल्लेखीत द्वितीय श्रेणी के वारिसो को सभी संपत्ति को समान शेयर में स्थानांतरित कर दिया जाएगा। यदि इसमें भी कोई वारिस का उल्लेख नहीं है, तो संपत्ति को समान रूप से उप-डिवीजन वर्ग सी में उल्लिखित वारिसों को हस्तांतरित किया जाएगा और उसी क्रम में, यदि इसमें कोई वारिस नहीं है, इसके बाद, संपत्ति को उपखंड में पंजीकृत वारिसों को स्थानांतरित कर दिया जाएगा। यह क्रम तब तक जारी रहेगा जब तक कि अंतिम उप-भाग में उत्तराधिकारियों का उल्लेख नहीं किया जाता है।

    अगर हम उदाहरण को देखें, तो वर्ग बी में पहला वारिस पिता है। तो उन्हें बिना वसीयत के मृत्यू ताधारकों की संपत्ति मिल जाएगी। यदि पिता जीवित नहीं है, तो बेटे का बेटा, बेटेकी बेटी की बेटी, भाई और बहन को अपनी संपत्ति का बराबर हिस्सा मिलेगा। अनुसूची के वर्ग सी और वर्ग डी के बीच उत्तराधिकार की व्यवस्था निम्न नियमों के अनुसार कक्षा सी और डी में की जाएगी।
 

नियम 1 - दो उत्तराधिकारियों में, जिनके पास कम या कोई वंशज रैंक नहीं है, उन्हें पहले दावा दिया जाएगा।
नियम 2 -जहां, वंशों की संख्या समान है या नहीं, उन विरासत को प्राथमिकता दी जाएगी।
नियम 3 - जहां नियम 1 या नियम 2 के तहत कोई उत्तराधिकारी दूसरे पर पूर्वता का हकदार नहीं है, अन्य सभी उत्तराधिकारी समान होंगे।

    अब आप समझगए होंगे के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और उसके प्रावधान क्या है। यदी आपको यह लेख पसंद आया हो तो आप हमे हमे सोशल मिडीया जैसे फेसबूक पेज को लाईक करे और युटूब चैनल को सबस्क्राईब करे जिस्से आप हमारे ग्रुप का हिस्सा बनजायेंगे।


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